पंजाब सरकार की 29 अप्रैल की विवादित चिट्ठी फिलहाल रोकी गई, उद्योग बोले—बिना स्पष्ट नीति के आर्थिक बोझ डालना गलत
चंडीगढ़ 20 June । पंजाब के उद्योग जगत को इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फीस (आईडीएफ) से जुड़े मामले में बड़ी राहत मिली है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार की ओर से दिए गए बयान के बाद पीएसपीसीएल ने 29 अप्रैल 2026 को जारी किए गए विवादित स्पष्टीकरण को फिलहाल रोक दिया है। यह मामला मंडी गोबिंदगढ़ इंडक्शन फर्नेस एसोसिएशन और एक अन्य औद्योगिक इकाई की याचिका से जुड़ा है।
उद्योग जगत का कहना है कि प्रदेश में पहले ही बिजली दरों, टैक्स, कच्चे माल की कीमतों और मंदी जैसे हालात से औद्योगिक इकाइयां दबाव में हैं। ऐसे में आईडीएफ जैसे शुल्कों को लेकर अचानक स्पष्टीकरण जारी करना उद्योगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने जैसा है। उद्यमियों का आरोप है कि सरकार और संबंधित विभागों को कोई भी फैसला लागू करने से पहले उद्योगों की वास्तविक स्थिति और उनकी आपत्तियों को गंभीरता से सुनना चाहिए था।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार के एडवोकेट जनरल ने कहा कि याचिकाकर्ता अपनी शिकायतें पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड के चेयरमैन के समक्ष रखें। साथ ही यह भी कहा गया कि इन शिकायतों पर तीन सप्ताह के भीतर सोच-समझकर फैसला लिया जाएगा। तब तक 29 अप्रैल 2026 को जारी किए गए विवादित कम्युनिकेशन को अमल में नहीं लाया जाएगा और उस पर जोर नहीं दिया जाएगा।
इसके बाद पीएसपीसीएल के सीई/कमर्शियल कार्यालय की ओर से 19 जून 2026 को जारी मेमो में साफ किया गया कि 29 अप्रैल 2026 को जारी स्पष्टीकरण को फिलहाल स्थगित रखा गया है। इस आदेश के बाद प्रदेश के उद्योगों ने राहत की सांस ली है।
उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि पंजाब सरकार एक तरफ निवेश लाने और उद्योगों को बढ़ावा देने की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ विभागीय स्तर पर ऐसे फैसले लिए जाते हैं, जिनसे उद्योगों में असमंजस और आर्थिक असुरक्षा पैदा होती है। मंडी गोबिंदगढ़ जैसे औद्योगिक केंद्र पहले ही उत्पादन लागत बढ़ने से जूझ रहे हैं। इंडक्शन फर्नेस, स्टील, इंजीनियरिंग और अन्य इकाइयों पर बिजली से जुड़े शुल्कों का सीधा असर पड़ता है।
उद्यमियों का कहना है कि यदि सरकार को उद्योग बचाने हैं तो नीतियां पारदर्शी, सरल और स्थिर होनी चाहिए। बार-बार नए शुल्क, स्पष्टीकरण और विभागीय आदेश उद्योगों की योजना और निवेश को प्रभावित करते हैं। छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए ऐसे फैसले और भी मुश्किलें बढ़ाते हैं, क्योंकि उनके पास बड़े उद्योगों जैसी वित्तीय क्षमता नहीं होती।
इस मामले ने सरकार की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। उद्योग जगत का कहना है कि अगर कोई आदेश कोर्ट में जाकर रोकना पड़े, तो इससे साफ है कि विभागीय स्तर पर पहले पर्याप्त विचार-विमर्श नहीं हुआ। सरकार को चाहिए कि वह उद्योगों को राजस्व का साधन मानने के बजाय रोजगार, उत्पादन और अर्थव्यवस्था की रीढ़ के रूप में देखे।
अब सभी की नजर पीएसपीसीएल चेयरमैन के फैसले पर टिकी है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को 22 जून 2026 तक अपना प्रतिनिधित्व देने को कहा है और पीएसपीसीएल को तीन सप्ताह में निर्णय लेना होगा। मामले की अगली सुनवाई 15 जुलाई 2026 को होगी।
फिलहाल हाईकोर्ट में सरकार के बयान और पीएसपीसीएल की कार्रवाई से उद्योगों को राहत जरूर मिली है, लेकिन उद्योग जगत की मांग है कि सरकार इस मामले में स्थायी समाधान निकाले और भविष्य में कोई भी शुल्क लागू करने से पहले उद्योगों से संवाद अनिवार्य किया जाए