साइकिल खरीद विवाद में कीमत के अंतर से लेकर OEM के ₹360 करोड़ टर्नओवर की शर्त और चयनित सप्लायर की पात्रता तक कई सवाल सामने आए हैं। सबसे अहम दावा सप्लाई किए गए मॉडल को लेकर है। यदि सरकार फ्रेम नंबरों को निर्माता के रिकॉर्ड, इनवॉइस और वर्क ऑर्डर से सत्यापित कर सार्वजनिक करती है, तो विवाद की वास्तविक तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है।
नई दिल्ली/लुधियाना : दिल्ली में स्कूली छात्राओं के लिए करीब 1.30 लाख साइकिलों की लगभग ₹90 करोड़ की खरीद अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर टेंडर की शर्तों, कीमत और वास्तविक सप्लाई की जांच का मुद्दा बनती जा रही है। आम आदमी पार्टी के दिल्ली अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने इस खरीद को लेकर कई गंभीर सवाल उठाते हुए सरकार से टेंडर फाइल, निर्माता के बिल, OEM Authorization, निरीक्षण रिपोर्ट और सप्लाई हुई साइकिलों के फ्रेम नंबर सार्वजनिक करने की मांग की है।
भारद्वाज का कहना है कि इस पूरे मामले की सच्चाई राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि केवल कुछ मूल दस्तावेज तय कर सकते हैं।
उनके आरोपों का केंद्र तीन बड़े सवाल हैं—टेंडर में कौन प्रवेश कर सकता था, सरकार ने किस कीमत पर खरीद की और जिस मॉडल के नाम पर वर्क ऑर्डर हुआ, क्या वही मॉडल वास्तव में छात्राओं तक पहुंचा ? दिल्ली सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए खरीद प्रक्रिया को पारदर्शी और नियमों के अनुसार बताया है।
सबसे बड़ा सवाल : ₹4,100 की पेशकश, खरीद करीब ₹6,957 में क्यों ?
सौरभ भारद्वाज ने प्रति साइकिल कीमत को लेकर सरकार पर सबसे तीखा हमला किया है। उन्होंने दावा किया कि एक अन्य साईकिल कंपनी Sk Bikes ने समान स्पेसिफिकेशन की साइकिल करीब ₹4,100 प्रति यूनिट उपलब्ध कराने की पेशकश की गई थी, जबकि सरकारी खरीद की दर करीब ₹6,923 से ₹6,957 प्रति साइकिल रही। दोनों कीमतों में करीब ₹2,800 प्रति साइकिल का अंतर है। 1.30 लाख साइकिलों पर इसकी सीधी गणना लगभग ₹36 से ₹37 करोड़ बैठती है।
हालांकि केवल दो कीमतों के अंतर को सरकारी नुकसान नहीं माना जा सकता। यह देखना जरूरी होगा कि दोनों प्रस्तावों में GST, ट्रांसपोर्ट, असेंबली, वारंटी, एक्सेसरीज, टेस्टिंग, डिलीवरी और तकनीकी स्पेसिफिकेशन समान थे या नहीं। भारद्वाज का कहना है कि सरकार इन दोनों प्रस्तावों की तुलनात्मक तकनीकी और वित्तीय शीट सार्वजनिक कर दे तो कीमत का विवाद तुरंत साफ हो सकता है।
₹ 90 करोड़ की खरीद, OEM के लिए ₹360 करोड़ टर्नओवर क्यों ? टेंडर की बिडिंग शर्त भी विवाद के केंद्र में है।
सौरभ भारद्वाज ने सवाल उठाया है कि करीब ₹90 करोड़ की इस खरीद के लिए OEM यानी मूल निर्माता के लिए लगभग ₹360 करोड़ के टर्नओवर की शर्त किस आधार पर तय की गई। उनका आरोप है कि इतनी ऊंची बिडिंग शर्त से कई साइकिल निर्माता प्रतिस्पर्धा से बाहर हो गए । भारद्वाज ने यह भी सवाल उठाया है कि क्या टेंडर प्रक्रिया में सभी योग्य कंपनियों को समान अवसर मिला और क्या ऐसी शर्तें वास्तव में समयबद्ध सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए जरूरी थीं या उनका असर प्रतिस्पर्धा सीमित करने वाला रहा।
बड़े सरकारी ऑर्डर में वित्तीय कपैसिटी , उत्पादन क्षमता, वारंटी और समय पर सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए टर्नओवर की शर्त असामान्य नहीं होती, लेकिन भारद्वाज का कहना है कि सरकार को यह बताना चाहिए कि ₹360 करोड़ का आंकड़ा तय करने का प्रशासनिक आधार क्या था।
Matta Sports के चयन पर भी सवाल ,कपैसिटी ने चयनित सप्लायर Matta Sports की भूमिका को लेकर भी सरकार से जवाब मांगा है।
भारद्वाज ने सवाल किया कि कंपनी ने इस बड़े ऑर्डर के लिए अपना पूर्व अनुभव, OEM Authorization, वित्तीय क्षमता और निर्माता से सप्लाई व्यवस्था किन दस्तावेजों के आधार पर साबित की।उनका कहना है कि यदि कंपनी ने टेंडर की सभी शर्तें पूरी की हैं तो सरकार संबंधित रिकॉर्ड सार्वजनिक कर विवाद समाप्त कर सकती है। यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़े सरकारी ऑर्डर केवल मौजूदा बिक्री नहीं देते, बल्कि भविष्य के टेंडरों के लिए अनुभव प्रमाणपत्र और बाजार में मजबूत पकड़ भी बनाते हैं। यही वजह है कि दिल्ली का यह टेंडर अब लुधियाना के साइकिल उद्योग में भी बड़ी कारोबारी महाजंग बन चुका है।
सबसे गंभीर आरोप : ‘Skyler’ का ऑर्डर, सप्लाई कौन-सी साइकिल ? पूरे विवाद की सबसे संवेदनशील परत साइकिल के मॉडल को लेकर है।
सौरभ भारद्वाज का कहना है कि टेंडर दस्तावेज में Hero Skyler 26T का उल्लेख है। उन्होंने दावा किया है कि छात्राओं को दी जा रही कुछ साइकिलों की तकनीकी बनावट Skyler मॉडल से मेल नहीं खाती। भारद्वाज नेता ने आरोप लगाया कि सप्लाई की गई साइकिलें Hero Bonfire मॉडल जैसी दिखाई देती हैं और उनमें Skyler से जुड़े बताए गए कुछ फीचर मौजूद नहीं हैं। लेकिन केवल तस्वीर, रंग, स्टिकर या बाहरी बनावट से किसी साइकिल का वास्तविक मॉडल तय नहीं किया जा सकता।
और यहीं से इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी सवाल सामने आता है—
साइकिल का फ्रेम नंबर क्या कहता है ?
हर साइकिल का फ्रेम नंबर उसके निर्माण रिकॉर्ड और बैच से जुड़ा होता है। यदि सरकार सप्लाई हुई कुछ साइकिलों के फ्रेम नंबर संबंधित निर्माता से सत्यापित कराए तो पता चल सकता है कि वह यूनिट किस मॉडल की है, कब बनी और किस उत्पादन बैच में तैयार हुई।
इसके बाद निर्माता की मूल इनवॉइस को सप्लायर की इनवॉइस और सरकारी वर्क ऑर्डर से मिलाया जा सकता है। यानी एक छोटा-सा फ्रेम नंबर पूरे ₹90 करोड़ के विवाद की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन सकता है।**
सरकार बोली—आरोप निराधार, खरीद प्रक्रिया पारदर्शी ,दिल्ली सरकार ने AAP के आरोपों को खारिज किया है।
सरकार का पक्ष है कि साइकिलों की कीमत को किसी दूसरे बाजार भाव से सीधे तुलना कर घोटाले का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता क्योंकि अलग-अलग मॉडल, फीचर, वारंटी, डिलीवरी और कॉन्ट्रैक्ट की शर्तें कीमत को प्रभावित करती हैं। सरकार ने खरीद प्रक्रिया को नियमों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार बताया है। ऐसे में अब विवाद का फैसला राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा दस्तावेजों पर निर्भर करेगा।
कारोबारी जंग या खरीद में गड़बड़ी ?
यह मामला फिलहाल सीधे “₹90 करोड़ का घोटाला” साबित नहीं करता। इतने बड़े सरकारी ऑर्डर में कंपनियों के व्यावसायिक हित भी दांव पर होते हैं और प्रतिस्पर्धी कंपनियों के आरोपों की स्वतंत्र जांच जरूरी होती है।
लेकिन कारोबारी प्रतिस्पर्धा का तर्क कीमत,
और मॉडल से जुड़े सवालों को खत्म भी नहीं करता।
अगर टेंडर की शर्तें उचित थीं, कीमत स्पेसिफिकेशन के अनुरूप थी और वही मॉडल सप्लाई हुआ जिसका वर्क ऑर्डर था, तो सरकार दस्तावेज सामने रखकर विवाद खत्म कर सकती है। और यदि फ्रेम नंबर, निर्माता बिल, मॉडल या निरीक्षण रिकॉर्ड में अंतर सामने आता है, तो यह मामला उद्योग की कारोबारी लड़ाई से निकलकर सरकारी खरीद की गंभीर जांच में बदल सकता है।
फिलहाल ₹90 करोड़ की इस लड़ाई में सबसे बड़ा गवाह कोई नेता या कंपनी नहीं—साइकिल का फ्रेम नंबर है।