New Delhi 27 June : 94 वर्षीय कोंड्रागुंटा महालक्ष्मम्मा की कहानी नागरिकता के कागजों से कहीं बड़ी है। यह उस भावनात्मक रिश्ते की कहानी है, जो इंसान को उम्र के अंतिम पड़ाव पर भी अपनी मिट्टी की ओर खींच लाता है। लंबे समय तक अमेरिका में रहने और वहां की नागरिकता लेने के बाद महालक्ष्मम्मा ने अब फिर भारत की नागरिकता स्वीकार की है।
आंध्र प्रदेश के बापटला में उन्होंने संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ ली। इस दौरान उनके चेहरे पर उम्र की थकान जरूर थी, लेकिन आंखों में अपनी जन्मभूमि से जुड़ने की चमक साफ दिखाई दी। उनका कहना है कि जीवन ने उन्हें विदेश तक पहुंचाया, लेकिन दिल हमेशा भारत में ही रहा। अब उनकी अंतिम इच्छा है कि वह भारतीय नागरिक के रूप में ही इस दुनिया को अलविदा कहें।
यह घटना सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की व्यक्तिगत इच्छा नहीं, बल्कि भारतीय पहचान, मातृभूमि और संस्कारों से जुड़े गहरे भाव की मिसाल है। महालक्ष्मम्मा ने साबित किया कि पासपोर्ट बदल सकता है, देश बदल सकता है, लेकिन अपनी मिट्टी से जुड़ा अपनापन उम्रभर कायम रहता है।