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श्रीनगर, 26 जनवरी : 26 जनवरी को देश भर में कश्मीर की अनोखी हाउसबोट और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को विशेष रूप से रेखांकित किया गया, लेकिन इस गौरव के पीछे एक गंभीर चिंता छिपी है। कश्मीर की पारंपरिक नौकाएं धीरे-धीरे अस्तित्व खोती जा रही हैं। डल, निगीन, झेलम और चुन्तीकुल जैसी कश्मीर की प्रसिद्ध झीलों और नदियों में कभी हजारों नौकाएं चला करती थीं। इनमें माल ढोने वाली कार्गो बोट, डूंगा बोट और विश्व-प्रसिद्ध हाउसबोट शामिल थीं। ये नौकाएं सिर्फ परिवहन और व्यापार का साधन नहीं थीं, बल्कि कश्मीर की मेहमाननवाजी और कारीगरी की पहचान भी थीं। आज स्थिति चिंताजनक है। कार्गो बोट पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं, जबकि कभी हजारों की संख्या में चलने वाली डूंगा बोट अब मात्र करीब 50 ही बची हैं। वहीं, मशहूर हाउसबोट की संख्या भी घटकर लगभग 800 रह गई है। सामाजिक कार्यकर्ता तारिक अहमद ने कहा, “राष्ट्रीय समारोहों में कश्मीर की विरासत को सराहा जाना अच्छी बात है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हमारी सांस्कृतिक पहचान लगातार कमजोर हो रही है। समय रहते इन ऐतिहासिक नौकाओं को बचाने के लिए सभी को आगे आना होगा।” पारंपरिक नौकाओं के खत्म होने से सिर्फ संस्कृति ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़े हजारों परिवारों की आजीविका भी प्रभावित हो रही है। हाउसबोट मालिक, कारीगर और नाविकों का भविष्य संकट में है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्थानीय प्रशासन, सांस्कृतिक संस्थाओं और आम लोगों को मिलकर संरक्षण की ठोस योजना बनानी होगी। यदि जल्द कदम नहीं उठाए गए, तो कश्मीर की झीलों पर तैरती पहचान इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह जाएगी।