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जालंधर और लुधियाना की सीमा पर सतलुज नदी के तट पर चल रही सरकारी रेत खदान अब सियासी और कानूनी अखाड़ा बन गई है।
जालंधर और लुधियाना की सीमा पर सतलुज नदी किनारे चल रही सरकारी रेत खदान अब सियासी और कानूनी टकराव का केंद्र बन गई है, जहां मजदूरों और ‘पनग्रेन’ के चेयरमैन तेजपाल सिंह गिल के बीच आरोप-प्रत्यारोप से तनाव चरम पर पहुंच गया है। मजदूरों और ‘कुल हिंद खेत मजदूर यूनियन’ के नेता बलजीत सिंह गोरसियां का आरोप है कि चेयरमैन ने ‘हिस्सा-पत्ती’ के विवाद में धक्काशाही करते हुए कुछ कामगारों को जबरन गाड़ियों में बैठाया, जिससे उनकी रोजी-रोटी पर खतरा मंडरा रहा है, वहीं चेयरमैन गिल ने इन आरोपों को खारिज कर इसे पुलिस की कार्रवाई बताया और उल्टा मजदूरों पर नियम तोड़कर सतलुज का रुख बदलने, अवैध माइनिंग करने और ओवरलोड वाहनों से सड़कों को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए। पुलिस के अनुसार असली विवाद खदान की ‘हदबंदी’ को लेकर है—यह तय होना बाकी है कि क्षेत्र जालंधर में आता है या लुधियाना में—और खदान के संचालन का फैसला माइनिंग विभाग ही करेगा। मामले की गंभीरता को देखते हुए अब ड्रोन मैपिंग के जरिए जांच की तैयारी है, जबकि राजस्व और माइनिंग विभाग की टीम मौके पर निशानदेही कर रही है; रिपोर्ट आने तक भारी पुलिस बल तैनात है और हालात तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में हैं, वहीं प्रशासन की भूमिका और अवैध माइनिंग पर उसकी चुप्पी भी सवालों के घेरे में है।