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चंडीगढ़/यूटर्न/4 अप्रैल। पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी भी नाबालिग की कस्टडी तय करते समय माता-पिता की शैक्षणिक योग्यता नहीं, बल्कि बच्चे का सर्वोत्तम हित सबसे महत्वपूर्ण होता है। अदालत ने मुक्तसर साहिब की फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए पिता की अपील खारिज कर दी। यह मामला एक डॉक्टर पिता द्वारा दायर अपील से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने दलील दी थी कि वह अधिक शिक्षित और सक्षम हैं, इसलिए बच्चे की कस्टडी उन्हें दी जानी चाहिए। साथ ही उन्होंने बच्चे की पढ़ाई प्रभावित होने और विजिटेशन राइट्स स्पष्ट न होने का मुद्दा भी उठाया था। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस Harsimran Singh Sethi की एकल पीठ ने पाया कि बीते छह वर्षों से बच्चा मां की देखरेख में रह रहा है और उसकी परवरिश में किसी प्रकार की लापरवाही का कोई ठोस सबूत रिकॉर्ड पर नहीं है। अदालत ने माना कि मां लगातार बच्चे के साथ रहकर उसकी देखभाल कर रही है, जो उसके समग्र विकास के लिए जरूरी है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 2019 में मां के खिलाफ दर्ज एक मामूली आपराधिक मामला, जिसमें उसे प्रोबेशन पर रिहा किया गया था, उसे अयोग्य ठहराने का आधार नहीं बन सकता। साथ ही कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि भारतीय समाज में कई कम शिक्षित माताएं भी बच्चों का बेहतर पालन-पोषण करती हैं, इसलिए केवल शैक्षणिक योग्यता को आधार बनाना उचित नहीं है। सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि पिता को अपनी नौकरी के चलते लंबे समय तक घर से बाहर रहना पड़ता है और उनके साथ रहने वाले बुजुर्ग माता-पिता भी अस्वस्थ हैं। ऐसे में बच्चे की निरंतर देखभाल चुनौतीपूर्ण हो सकती है। बच्चे की पढ़ाई को लेकर उठाए गए सवालों पर भी कोर्ट ने कहा कि फीस न जमा होने के कारण पढ़ाई प्रभावित हुई, जिसकी जिम्मेदारी पिता पर भी आती है। इस आधार पर मां की अभिभावकता पर सवाल उठाना उचित नहीं ठहराया गया। विजिटेशन राइट्स के मुद्दे पर अदालत ने कहा कि यदि कोई अस्पष्टता है तो पिता फैमिली कोर्ट में आवेदन देकर समाधान प्राप्त कर सकते हैं, इसे कस्टडी आदेश को रद्द करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। इन सभी पहलुओं पर विचार करते हुए हाई कोर्ट ने पिता की अपील खारिज कर दी और बच्चे की कस्टडी मां के पास बनाए रखने के आदेश को कायम रखा।