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लोग करेंगे शिकायत तो होगी कार्रवाई, मामला अस्पताल की फार्मेसी से मरीज को दवाइयां खरीदने के लिए करना मजबूर - Uturn Time
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अशोक साहगल लुधियाना यूटर्न 25 मार्च : आए दिन देखने में याद आता है कि अस्पताल अपनी फार्मेसी से मरीजों को दवाइयां खरीदने के लिए मजबूर करते हैं और बाहर से दवाई चाहे जितनी मर्जी सस्ती हो मरीज के परिजनों को नहीं लेने दी जाती इससे मरीजों पर अनावश्यक आर्थिक बहुत तो बढ़ता ही है पर दूसरी और अस्पतालों की लूट भी खुलकर सामने आती है इस संसार में स्वास्थ्य विभाग की उच्च अधिकारियों का कहना है कि लोग अक्सर ऐसे मामलों की शिकायत नहीं करते शिकायत करने पर मामले की व्यापक स्तर पर जांच कराई जा सकती है इसलिए लोगों को चाहिए कि वह आगे आकर अगर कहीं होने लगता है कि अस्पताल बेवजह इलाज और दवाइयां के अधिक पैसे ले रहा है तो उसे तुरंत स्थानीय सिविल सर्जन को अपनी शिकायत दर्ज करानी चाहिए जिस पर मेडिकल बोर्ड बनाकर जांच कराई जा सकती है खबर पढ़ कर सामने आये कई मामले इस सिलसिले में यू टर्न टाइम्स में प्रकाशित आज की खबर को देखते हुए कई लोग सामने आए जिनमें से एक सीनियर सिटीजन ने सामने आकर अपना मामला रखा जिसमें उन्होंने बताया कि उन्होंने अपनी पत्नी का उपचार फोर्टिस अस्पताल गुरुग्राम में कराया था जो बुखार के कारण अस्पताल में भर्ती हुई थी परंतु उसका उपचार इतना लंबा चलाया गया कि उनका कुछ दिनों में उनके 25 लख रुपए खर्च हो गए और अस्पताल किया कर्मचारियों की गलती की वजह से मरीज की हालत में सुधार होने की बजाय उसकी हालत बिगड़ती चली गई जब उन्होंने मरीज की हालत देखते हुए अस्पताल प्रबंधन को से अपनी शिकायत दर्ज कराई तो उन्होंने उपचार की कीमतों में डिस्काउंट देने का वादा करते हुए आईसीयू के खर्चों में कमी कर दी और उन्हें बाहर से दवाइयां लाने के लिए छूट दे दी कीमतों में जमीन आसमान का अंतर प्रधानमंत्री कार्यालय को 30 पेज की शिकायत लिखने वाल प सीनियर सिटीजन ने आगे बताया कि जब उन्होंने देखा कि जो दवाई अस्पताल में लगभग 6600 की मिल रही थी वह बाहर से मात्र ₹600 में आ गई तो उनके पैरों के तले से जमीन निकल गई 73 वर्षीय भुक्त भोगी ने बताया आईसीयू में पत्नी को भर्ती करने के बाद उन्हें पता चला कि मरीज के परिजनों को अस्पताल में रुकने के लिए कोई प्रबंध नहीं था मरीज के परिजनों को ठहरने के लिए कोई जगह नहीं दी गई और ना ही उन्हें कमरा अलॉट किया गया परंतु अनुभव के आधार पर उन्हें अस्पताल और फार्मा नेक्सस का माजरा समझ आने लगा जिसे लेकर उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय स्थित कई संस्थाओं उच्च अधिकारियों को भी पत्र लिखा है जिसमें उन्होंने लोकहित में लोगों को सस्ता उपचार उपलब्ध कराने के लिए दवाइयां की सिस्टमैटिक ओवर प्राइसिंग और अस्पताल तथा फार्मास्यूटिकल कंपनियों के गठजोड़ की व्यापक जांच करने की मांग की है ताकि अस्पताल अंधी लुट न कर सके ज़रूरी दवाओं की MRP में बनावटी बढ़ोतरी उन्होंने कहा कि आवश्यक दवाइयां की कीमतों में बनावटी बढ़ोतरी की जा रही है जो बनाने की लागत से जुड़ी हुई नहीं है बल्कि लाभ करवाने के लिए रखी गई है उन्होंने देखा कि अस्पताल दवा पर छपे हुए निर्धारित एमआरपी से बहुत कम कीमत पर दवाइयां खरीद रहे हैं और मरीजों को एमआरपी पर खरीदने के लिए मजबूर कर रहे हैं उल्लेखनीय है कि अस्पतालों नर्सिंग होम तथा निजी क्लिनिको ने अपनी दवाइयां बनवानी शुरू कर दी है और उसकी कीमत भी अपनी मर्जी पर प्रिंट कराई हुई है सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजनाएं हो जाती है फेल लोगों के कहना है कि अस्पतालों द्वारा मचाई जा रहे लूट के कारण ही सरकारी शहर बीमा योजना अक्सर फेल हो जाती हैं क्योंकि निजि और कॉरपोरेट अस्पताल कम कीमतों में उपचार करने के लिए तैयार नहीं होते और सरकारी योजनाओं से बचने की कोशिश करते हैं हाल ही में सरकार द्वारा शुरू की गई 10 लाख की सेहत बीमा योजना को लागू करने के लिए निजी अस्पताल और कॉरपोरेट अस्पताल काफी आनाकानी कर रहे हैं आने वाले दिनों में इस पॉलिसी को खराब करने के लिए निजी और कॉरपोरेटर अस्पताल मरीजों को सरकारी अस्पतालों में रेफर करते हुए दिखाई दे सकते हैं जबकि सरकारी उच्च अधिकारियों का कहना है कि 10 लाख की स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी में सभी निजी अस्पतालों और कॉर्पोरेट अस्पतालों जिसमें फोर्टिस, अपोलो, मैक्स तथा एसपीएस आदि अस्पताल की श्रेणी शामिल है को 10 लाख की स्वास्थ्य सेहत बीमा योजना लागू करने के लिए कहा गया है विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी पॉलिसीयों को निजी तथा कॉरपोरेट अस्पताल ही खराब करते हैं पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों का इलाज करते हैं मुफ्त अक्सर देखने में सामने आया है कि निजी तथा कॉरपोरेटर अस्पताल पुलिस व प्रश्न प्रशासनिक उच्च अधिकारियों का उपचार निशुल्क करते हैं ताकि कभी उन पर कोई बुरा समय आए जो अक्सर मरीजों की शिकायत के रूप में सामने आता है तो उनसे मदद ली जा सके लाखों रुपए का निशुल्क के उपचार करने की बजाय व चंद् गरीबों का उपचार मुफ्त में करने में आनाकानी करते हैं बावजूद उनके लाखों का बिल क्यों ना आए अस्पताल बड़े आराम से उसे माफ कर देते हैं कॉर्पोरेट अस्पतालों को चाहिये आमीर मरीज खाल उतारने के लिए कॉरपोरेट और निजी अस्पतालों जहां डॉक्टरों के भी टारगेट फिक्स किए जाते हैं वहां पर ऐसे मरीजों का वेलकम किया जाता है जिसके पास मोटी बीमा पॉलिसी हो और उसके पास अच्छे खासे पैसे और संपत्ति हो अब तो अस्पताल अपने फार्म में मरीजों की संपत्ति आदि का ब्योरा भी दर्ज करने लगे हैं ताकि उसकी माली हालत का अंदाजा लगाया जा सके और उसके अनुरूप उसका अस्पताल में स्टे बढा कर उसका बिल बनाया जा सके