Uturn Time
Breaking
Ludhiana: नगर निगम कर्मचारियों का पंजाब सरकार के खिलाफ प्रदर्शन, मांगों को लेकर सौंपा ज्ञापन Amritsar: अमृतसर में रेलवे ट्रैक के पास फिर मिला संदिग्ध कैमरा, सुरक्षा एजेंसियों में हड़कंप Jalandhar: PM मोदी के स्वागत की तैयारी तेज, केंद्रीय मंत्री बिट्टू ने लिया इंतजामों का जायजा Amritsar: बब्बर खालसा इंटरनेशनल नेटवर्क पर शिकंजा,हथियारों और विस्फोटकों की खेप बरामद, सीआई ने तीन तस्करों को दबोचा New Delhi: भारत ने पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट का किया सफल परीक्षण, 60 किमी दूर लक्ष्य पर साधा सटीक निशाना Dehradun: उत्तराखंड बना देश का छठा पूर्ण साक्षर राज्य, 98.7% साक्षरता दर का बनाया रिकॉर्ड Jalandhar: PM मोदी के कार्यक्रम से पहले जालंधर कैंट स्टेशन की तैयारियों का निरीक्षण, रवनीत बिट्टू ने परखी व्यवस्थाएं रेलवे क्वार्टर से मिली टेक्नीशियन की लाश, बदबू आने पर पता चला इनीशिएटर्स ऑफ चेंज के नेतृत्व में सतलुज फिल्म की बहाली को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन सेंसेक्स 1,677 अंक गिरा, गिरावट के तीन मुख्य कारण निकलकर आए सामने जगतार सिंह को मिला प्रमोशन, जॉइंट सीपी ने इंस्पेक्टर पद पर किया पदोन्नत लुधियाना में राजस्व पटवार यूनियन की बैठक, जालंधर में प्रदर्शन में शामिल होने का ऐलान
Logo
Uturn Time
चंडीगढ़/ यूटर्न/20 मार्च।पंजाब की सहकारी समितियों से जुड़े कर्मचारियों को बड़ा झटका देते हुए पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने वर्ष 1997 के सेवा नियमों को अवैध घोषित कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन नियमों के आधार पर ग्रेच्युटी, लीव एनकैशमेंट और अन्य रिटायरमेंट लाभों का दावा नहीं किया जा सकता। यह अहम फैसला जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की पीठ ने कई याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए सुनाया। इनमें सेवानिवृत्त कर्मचारियों की याचिकाएं भी शामिल थीं, जिनमें बकाया लाभ और ब्याज की मांग की गई थी। ‘सब-डेलीगेशन’ को बताया अवैध अदालत ने अपने फैसले में कहा कि पंजाब कोआपरेटिव सोसाइटीज एक्ट , 1961 के तहत सेवा नियम बनाने का अधिकार केवल राज्य सरकार के पास है। 1963 के नियमों के जरिए यह शक्ति रजिस्ट्रार को सौंप दी गई थी, जिसके आधार पर 1997 के सेवा नियम बनाए गए। कोर्ट ने इसे ‘सब-डेलीगेशन’ करार देते हुए कानून के विरुद्ध बताया। नियमों को वैधानिक मान्यता नहीं कोर्ट ने कहा कि 1997 के सेवा नियम न तो वैधानिक हैं और न ही इन्हें विधानसभा के समक्ष पेश किया गया। ऐसे में इन नियमों के आधार पर कोई कानूनी अधिकार उत्पन्न नहीं होता और न ही इन्हें लागू कराने के लिए अदालत का सहारा लिया जा सकता है। सहकारी समितियां स्वतंत्र संस्थाएं फैसले में अदालत ने कहा कि सहकारी समितियां स्वतंत्र संस्थाएं हैं, जो अपने संसाधनों से कर्मचारियों का वेतन और अन्य खर्च उठाती हैं। राज्य सरकार इनकी वित्तीय जिम्मेदारी नहीं लेती, इसलिए इन पर सरकारी कर्मचारियों जैसे वेतन और रिटायरमेंट लाभ का बोझ डालना व्यावहारिक नहीं है। आर्थिक स्थिति पर भी टिप्पणी कोर्ट ने माना कि अधिकांश सहकारी समितियां आर्थिक संकट से जूझ रही हैं और कई के पास कर्मचारियों का नियमित वेतन देने तक के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। ऐसे में भारी-भरकम रिटायर लाभ देना संभव नहीं है। याचिकाएं खारिज, समिति को राहत अदालत ने कर्मचारियों की सभी याचिकाएं खारिज कर दीं, जबकि एक सहकारी समिति की याचिका को स्वीकार करते हुए अधिकारियों द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस रद्द कर दिया। साथ ही निर्देश दिया गया कि समिति को जबरन भुगतान के लिए बाध्य न किया जाए। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले से दिए गए रिटायरमेंट लाभों की कोई वसूली नहीं की जाएगी।