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होशियारपुर/दलजीत अज्नोहा हमारा भवन केवल निर्माण,दिशा,आंतरिक सरंचना, द्वार,कमरों,ग्रहो,पंच तत्व,रंग आदि तक सीमित नहीं है बल्कि यह हमारे मन ओर भावनाओं से जुड़ा हुआ है ।हमारे भवन की हर एक दीवार,रंग,वस्तु और भीति चित्र हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं,हम भवन में रखी हुई जैसी वस्तुओं को देखेंगे या जैसे चित्रों को देखेंगे वैसे ही विचार हमारे मन मस्तिष्क में तरंगों के रूप में उत्पन्न होंगे दुखद चित्रण मन के भीतर दुख उत्पन्न करेंगे ओर सोम्य चित्र सुखद अनुभूति उत्पन्न करेंगे ऐसा मानना है अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वास्तुविद एवं लेखक डॉ भूपेन्द्र वास्तुशास्त्री का ।वास्तु में जिस मूर्ति या चित्र को देखकर नकारात्मक विचार उत्पन्न होते हैं उसे वैदिक वास्तु में चित्र वेध कहा गया है इसलिए ऐसे चित्रों को घरों में नहीं रखना चाहिए जैसे युद्ध का चित्रण,ग़रीबी,रोना-धोना,विरह,वेदना,शर शैया,टूटा-दिल,टूटी खाट,रक्तरंजित चित्रण,शिकारी दृश्य,क्रोधित नग्नता ओर उदास चेहरा,हिंसक जानवर,डूबते युद्धपोत,दैत्य,मायावी शक्ति,जादूटोना आदि ।अगर उपरोक्त चित्र गलती से शयनकक्ष में लगा दिया जाए तो मानव अपने वैवाहिक,सामाजिक ओर मानसिक स्थिति में अवसाद से ग्रसित हो सकता है ।ओर अपने आप को असुरक्षित असह्याय समझ सकता हैं ।