आठ जिलों के 437 गांव अब भी प्रभावित, 17 हजार हेक्टेयर से ज्यादा कृषि भूमि जलमग्न; सरकार ने राहत शिविर, मेडिकल टीमें और नावों की संख्या बढ़ाई, जबकि प्रभावित परिवार नए सिरे से जिंदगी बसाने की कठिन चुनौती का सामना कर रहे हैं।
गुवाहाटी (Naren Danu) : असम में बाढ़ का पानी भले ही धीरे-धीरे उतर रहा हो, लेकिन तबाही के निशान अभी भी साफ दिखाई दे रहे हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित शिवसागर जिले में कई गांवों की तस्वीर भयावह बनी हुई है। घरों से लेकर गलियों तक कमर तक मिट्टी की गाद जमा है, जिससे लोगों के लिए अपने ही घरों में लौटना मुश्किल हो गया है। कई परिवार अब भी अपने लापता परिजनों की तलाश में हैं, जबकि प्रशासन के पास ऐसे लोगों का कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
ऊपरी असम के शिवसागर, चराईदेव, जोरहाट और गोलाघाट जिले सबसे अधिक प्रभावित हैं। राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है, लेकिन बड़ी संख्या में लोग अभी भी अपने घरों में लौटने की स्थिति में नहीं हैं। बाढ़ ने मकानों, खेतों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है।
मौतों का आंकड़ा 80 पहुंचा, आठ जिले अब भी प्रभावित
असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एएसडीएमए) के 30 जुलाई के आंकड़ों के अनुसार, शिवसागर जिले में दो और शव मिलने के बाद बाढ़ से मरने वालों की संख्या बढ़कर 80 हो गई है। नुमलीगढ़ क्षेत्र में धनसिरि नदी अब भी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है।
फिलहाल राज्य के आठ जिले—गोलाघाट, शिवसागर, बिश्वनाथ, चराईदेव, कामरूप (मेट्रो), जोरहाट, धेमाजी और नगांव—बाढ़ की चपेट में हैं। इन जिलों के 437 गांवों की करीब 2.12 लाख आबादी प्रभावित है, जबकि 17,198 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि अब भी जलमग्न है।
राहत शिविरों में हजारों लोग, मेडिकल टीमें और नावें तैनात
राज्य सरकार ने प्रभावित इलाकों में 62 राहत शिविर और 50 राहत वितरण केंद्र संचालित किए हैं। राहत शिविरों में 13,294 लोग रह रहे हैं, जबकि 62,289 लोग वितरण केंद्रों के माध्यम से सहायता प्राप्त कर रहे हैं।
राहत कार्यों में एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, सेना, अर्धसैनिक बल, वायुसेना, पुलिस, अग्निशमन विभाग और स्थानीय प्रशासन जुटा हुआ है। प्रभावित क्षेत्रों में 94 मेडिकल टीमें तैनात की गई हैं, जबकि 26 नावों के जरिए राहत और बचाव अभियान चलाया जा रहा है।
अब सबसे बड़ी चुनौती पुनर्वास
विशेषज्ञों का मानना है कि पानी उतरने के बाद अब असली चुनौती पुनर्वास की है। घरों में जमी मोटी गाद, क्षतिग्रस्त सड़कें, टूटे पुल और बर्बाद फसलें प्रभावित परिवारों के सामने आजीविका का संकट खड़ा कर रही हैं। ऐसे में राहत के साथ-साथ पुनर्निर्माण और आजीविका बहाली पर सरकार का फोकस बढ़ना जरूरी होगा।