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100 से अधिक भारतीय कंपनियों को जोड़कर विकसित होगा स्वदेशी रक्षा इकोसिस्टम; विशेषज्ञ बोले- अगले दो दशकों में दिखेगा असली असर
बेंगलुरु (Narendra Singh Danu) : भारत का एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) कार्यक्रम केवल एक नया लड़ाकू विमान विकसित करने की परियोजना नहीं, बल्कि देश के रक्षा और एयरोस्पेस उद्योग को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सबसे महत्वाकांक्षी पहल माना जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना आने वाले 10 से 20 वर्षों में भारत को पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमान विकसित करने की क्षमता प्रदान करने की मजबूत नींव रखेगी। रक्षा मंत्रालय ने पहली बार एएमसीए के प्रोटोटाइप निर्माण के लिए निजी क्षेत्र के कंसोर्टियम से प्रस्ताव (आरएफपी) आमंत्रित किए हैं। इसका उद्देश्य केवल विमान तैयार करना नहीं, बल्कि 100 से अधिक भारतीय कंपनियों को जोड़कर एक मजबूत रक्षा विनिर्माण इकोसिस्टम विकसित करना है, जिससे भविष्य में उन्नत सैन्य विमान और रक्षा प्रणालियां देश में ही विकसित की जा सकें। आधुनिक तकनीकों का होगा स्वदेशी विकास एएमसीए परियोजना के तहत स्टील्थ डिजाइन, इंटरनल वेपन बे, अत्याधुनिक रडार, सेंसर फ्यूजन, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, एडवांस्ड मिशन कंप्यूटर, नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित तकनीकों का विकास किया जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार, इन तकनीकों में दक्षता हासिल होने के बाद भारत भविष्य में और अधिक उन्नत लड़ाकू विमानों का विकास अपेक्षाकृत कम लागत और कम विदेशी निर्भरता के साथ कर सकेगा। निजी उद्योग निभाएगा अहम भूमिका परियोजना में एयरफ्रेम, कंपोजिट स्ट्रक्चर, सेंसर, रडार, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और इंजन सपोर्ट जैसे क्षेत्रों में सरकारी संस्थानों के साथ निजी कंपनियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। इससे देश में उच्च तकनीक विनिर्माण, अनुसंधान एवं विकास और रक्षा उत्पादन क्षमता को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है। शुरुआती चरण में विदेशी इंजन, लक्ष्य स्वदेशी तकनीक एएमसीए के शुरुआती प्रोटोटाइप में अमेरिका के GE-F414 इंजन का उपयोग किए जाने की योजना है। हालांकि, सरकार का दीर्घकालिक लक्ष्य स्वदेशी इंजन तकनीक विकसित कर विदेशी निर्भरता को समाप्त करना है। इसी दिशा में घरेलू इंजन विकास कार्यक्रमों पर भी समानांतर रूप से काम किया जा रहा है। 2028 तक पहली उड़ान का लक्ष्य सरकार की योजना के अनुसार निजी भागीदार के चयन के बाद पांच उड़ान योग्य प्रोटोटाइप तैयार किए जाएंगे। पहला प्रोटोटाइप 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत तक तैयार करने तथा 2028 में उसकी पहली उड़ान कराने का लक्ष्य रखा गया है। इसके बाद व्यापक परीक्षण, हथियारों के एकीकरण, स्टील्थ क्षमता और विभिन्न परिचालन परिस्थितियों में मूल्यांकन की प्रक्रिया चलेगी। आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग की मजबूत नींव रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि एएमसीए की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल एक आधुनिक लड़ाकू विमान नहीं होगी, बल्कि उसके माध्यम से विकसित होने वाला स्वदेशी औद्योगिक और तकनीकी ढांचा होगा। यदि यह परियोजना सफल रहती है तो भारत न केवल अपनी वायुसेना की भविष्य की जरूरतें पूरी करने में सक्षम होगा, बल्कि वैश्विक रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेगा। इससे उच्च तकनीक विनिर्माण, रोजगार, अनुसंधान और रक्षा निर्यात के नए अवसर भी पैदा होंगे।