चंडीगढ़/यूटर्न/9 जुलाई। सरकारी बैंक ऑफ़ बड़ौदा ने यूएई की बड़ी हेल्थकेयर कंपनी एनएमसी हेल्थ के डूबने से जुड़े लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद को सुलझाने के लिए 600 मिलियन डॉलर (लगभग 5,700 करोड़) देने पर सहमति जताई है। इससे किसी भारतीय सरकारी बैंक से जुड़े सबसे बड़े क्रॉस-बॉर्डर कानूनी विवादों में से एक का अंत हो गया है। एनएमसी हेल्थ के जॉइंट एडमिनिस्ट्रेटर्स के साथ हुए इस समझौते से अबू धाबी और यूके की अदालतों में चल रही कार्यवाही खत्म हो गई है, और बैंक ने अपनी कोई गलती नहीं मानी है। यह विवाद 2020 में एनएमसी हेल्थ के अचानक डूबने से शुरू हुआ था, जब जांचकर्ताओं को 4 बिलियन डॉलर से ज़्यादा का ऐसा कर्ज़ मिला था जिसके बारे में पहले जानकारी नहीं दी गई थी। इससे मिडिल ईस्ट में कॉर्पोरेट जगत की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक घटना हुई। इसके बाद कंपनी के जॉइंट एडमिनिस्ट्रेटर्स ने एनएमसी के फाउंडर बीआर शेट्टी, पूर्व सीईओ प्रशांत मंगहट और बैंक ऑफ़ बड़ौदा पर केस किया। उन्होंने आरोप लगाया कि बैंक की अबू धाबी ब्रांच ने बिना ज़रूरी जांच-पड़ताल, एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग (एएमएल) चेक और 'नो योर कस्टमर' (केवाईसी) नियमों का पालन किए बिना ट्रांज़ैक्शन किए।
देनदारी 600 मिलियन डॉलर तक सीमित
रेगुलेटरी फाइलिंग के अनुसार, समझौते के तहत बैंक ऑफ़ बड़ौदा की देनदारी 600 मिलियन डॉलर तक सीमित है, और बैंक के खिलाफ सभी दावों का समाधान बिना किसी गलती को माने कर लिया गया है। अबू धाबी ग्लोबल मार्केट (एडीजीएम) कोर्ट में कार्यवाही पहले ही बंद कर दी गई है, जबकि इंग्लैंड में इससे जुड़ी कार्यवाही वापस ली जा रही है। समझौते की बाकी शर्तें गोपनीय रखी गई हैं।
ट्रायल शुरु होने के बाद समझौता
यह समझौता अबू धाबी में ट्रायल शुरू होने के बाद हुआ है। कानूनी जानकारों का कहना है कि इस समझौते से दोनों पक्षों को लंबे समय तक चलने वाले कानूनी विवाद से जुड़ी अनिश्चितता, खर्च और संभावित जोखिमों से बचने में मदद मिलेगी। BoB ने इस पेमेंट को विवाद खत्म करने के लिए लिया गया एक कमर्शियल फैसला बताया है। इस घोषणा का असर निवेशकों की सोच पर भी पड़ा; समझौते की जानकारी सामने आने के बाद बैंक ऑफ़ बड़ौदा के शेयरों में 4% से ज़्यादा की गिरावट आई।
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