राम तीर्थ में मंदिर निर्माण के ऐलान से तेज हुई सियासी हलचल, भक्ति संध्याओं से लेकर मंदिरों के लिए फंड और मुफ्त तीर्थयात्रा तक सरकार के फैसलों को ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा; 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा के बढ़े वोट शेयर के बीच AAP का शहरी और हिंदू मतदाताओं पर फोकस, टूटे अकाली-भाजपा समीकरण के बाद बदले पंजाब के सियासी समीकरण
चंडीगढ़ (Naren Danu) : पंजाब की राजनीति में आम आदमी पार्टी ने अब धार्मिक मुद्दों को लेकर अपना रुख और ज्यादा मुखर कर दिया है। पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने अमृतसर के ऐतिहासिक राम तीर्थ में 150 करोड़ रुपये की लागत से लव-कुश मंदिर बनाने की घोषणा कर राजनीतिक बहस को नई दिशा दे दी है। केजरीवाल ने इस दौरान आम आदमी पार्टी को ‘सनातनी’ पार्टी के तौर पर पेश किया।
पंजाब सरकार की ओर से जून से सरकारी स्तर पर भक्ति संध्याओं का आयोजन किया जा रहा है। इन्हें अब राज्य के सभी 22 प्रमुख शहरों तक ले जाने की तैयारी है। इसके अलावा पटियाला के काली माता मंदिर के लिए 80 करोड़ रुपये, हर वर्ष करीब 1.5 लाख श्रद्धालुओं के लिए मुफ्त तीर्थयात्रा, मंदिर प्रबंधन को अधिक अधिकार देने वाले कानून और विभिन्न जातियों के कल्याण के लिए एक दर्जन से ज्यादा बोर्ड गठित करने जैसे कदम भी चर्चा में हैं।
AAP के लिए सॉफ्ट हिंदुत्व नया प्रयोग नहीं
अरविंद केजरीवाल की धार्मिक राजनीति अचानक सामने आई रणनीति नहीं है। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 से पहले उन्होंने सार्वजनिक तौर पर हनुमान चालीसा का पाठ किया था। गुजरात और हिमाचल प्रदेश चुनाव के दौरान भारतीय मुद्रा पर भगवान गणेश और देवी लक्ष्मी की तस्वीर लगाने की मांग भी उठाई गई थी। 2024 में अयोध्या में राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा के मौके पर दिल्ली की सभी 70 विधानसभा सीटों में सुंदरकांड और रामचरितमानस पाठ आयोजित किए गए।
राजनीतिक विश्लेषण में इसे भाजपा की हिंदुत्व राजनीति के समानांतर AAP की ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। खासकर पंजाब में यह दांव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा लगातार राज्य के शहरी हिंदू मतदाताओं के बीच अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
भाजपा का बढ़ता वोट शेयर AAP के लिए चुनौती
2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब में भाजपा का वोट शेयर 18.5 प्रतिशत तक पहुंच गया, जबकि 2019 में यह 9.63 प्रतिशत और 2022 के विधानसभा चुनाव में 6.6 प्रतिशत था। पार्टी लोकसभा में कोई सीट नहीं जीत सकी, लेकिन 117 विधानसभा क्षेत्रों में से 24 पर सबसे आगे रही। इनमें बड़ी संख्या शहरी सीटों की थी।
पंजाब में हिंदू आबादी करीब 38 प्रतिशत मानी जाती है। संख्या में यह बहुसंख्यक समुदाय नहीं है, लेकिन इसकी शहरी और कस्बाई मौजूदगी चुनावी समीकरणों पर बड़ा असर डालती है। करीब 34 विधानसभा सीटों पर हिंदू समुदाय सबसे बड़ा सामाजिक समूह है, जबकि कई अन्य सीटों पर इसकी संख्या जीत-हार तय करने की स्थिति में है।
अकाली-भाजपा गठबंधन टूटने के बाद बदले समीकरण
पंजाब की चुनावी राजनीति में शहरी हिंदू मतदाता लंबे समय से किसी एक दल के स्थायी वोट बैंक नहीं रहे। उग्रवाद के दौर में कांग्रेस को इस वर्ग का मजबूत समर्थन मिला। इसके बाद 1997 में अकाली दल और भाजपा गठबंधन ने ग्रामीण और शहरी वोटों का अलग-अलग राजनीतिक आधार तैयार किया। अकाली दल ग्रामीण सिख मतदाताओं पर मजबूत रहा, जबकि भाजपा शहरी हिंदू मतदाताओं के बीच प्रभावी बनी रही।
2020 में गठबंधन टूटने के बाद भाजपा का ग्रामीण आधार कमजोर हुआ और अकाली दल को शहरी हिंदू वोटों का नुकसान उठाना पड़ा। 2022 के विधानसभा चुनाव में AAP को इसका लाभ मिला और पार्टी ने माझा व मालवा के कई शहरी हिंदू इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत की।
‘साइलेंट वोटर’ का गणित
पंजाब की राजनीति में हिंदू मतदाताओं को अक्सर ‘साइलेंट वोटर’ के रूप में देखा जाता है। यह वर्ग चुनावी नारों के बजाय मतदान के जरिए अपनी राजनीतिक पसंद बदलने के लिए जाना जाता है। पिछले चुनावों में हिंदू वोटों में मामूली बदलाव का भी सत्ता के समीकरण पर बड़ा असर देखने को मिला है।
यही कारण है कि भाजपा के बढ़ते वोट शेयर और शहरी क्षेत्रों में उसकी मौजूदगी AAP के लिए चुनौती बन रही है। AAP अब धार्मिक आयोजनों, मंदिर विकास और तीर्थयात्रा जैसी पहलों के जरिए इस वर्ग के बीच अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश करती नजर आ रही है।
बंगाल मॉडल से अलग है पंजाब
पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भाजपा ने हिंदू मतदाताओं के ध्रुवीकरण के जरिए अपना आधार मजबूत किया, लेकिन पंजाब का सामाजिक समीकरण इससे अलग है। यहां हिंदू मतदाता किसी एक जाति या सामाजिक समूह में सीमित नहीं हैं। व्यापारी, उद्योगपति, पेशेवर और विभिन्न जातीय समूह इस वर्ग का हिस्सा हैं।
ऐसे में AAP का नया ‘सनातनी’ चेहरा केवल धार्मिक राजनीति तक सीमित नहीं माना जा रहा। इसके पीछे शहरी व्यापारियों, उद्योगपतियों और हिंदू मतदाताओं के उस हिस्से को अपने साथ बनाए रखने की कोशिश भी दिखाई देती है, जो भाजपा की ओर बढ़ रहा है। पंजाब में आने वाले चुनावों में यही सियासी प्रयोग AAP और भाजपा के बीच शहरी हिंदू वोटों की नई जंग का आधार बन सकता है।