स्त्री: सृष्टि की जननी और अंतहीन संघर्ष की महागाथा
लेखिका :डॉ. रवनीत कौर
परमात्मा की सबसे अद्भुत और सुंदर रचना 'स्त्री' असीम गुणों का भंडार है । वह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि की धड़कन है । वह ममता की शीतल छाया, त्याग की ज्योति और साहस की साक्षात प्रतिमा है । लेकिन विडंबना देखिए कि जिस स्त्री ने जीवन को जन्म दिया, उसी को सदियों तक अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ा ।
ऐतिहासिक संघर्ष और वैश्विक पहचान
बीसवीं सदी के प्रारंभ से ही महिलाओं ने अपने श्रम अधिकारों, मताधिकार और समान अवसरों के लिए आवाज उठानी शुरू की । इस लंबे संघर्ष को मान्यता देते हुए संयुक्त राष्ट्र ने 1975 को आधिकारिक रूप से “अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष” घोषित किया ।
इसका मुख्य उद्देश्य समानता, विकास और शांति जैसे सिद्धांतों को बढ़ावा देना था ।
1975 में ही मैक्सिको सिटी में पहला विश्व महिला सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें 100 से अधिक देशों ने भाग लिया ।
इसके बाद 1976 से 1985 तक के समय को "संयुक्त राष्ट्र महिला दशक" के रूप में मनाया गया ।
चूल्हे से शिखर तक: दोहरी जिम्मेदारी का बोझ
आज की स्त्री ने साबित कर दिया है कि वह किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है। वह 'चूल्हे से शिखर' तक की यात्रा तय कर चुकी है । वह घर भी संभालती है, नौकरी भी करती है और परिवार की हर जिम्मेदारी मुस्कान के साथ निभाती है ।
हालाँकि, समाज का एक कड़वा सच यह भी है कि यदि संतान न हो, तो सारा दोष स्त्री पर मढ़ दिया जाता है । उसे अक्सर एक इंसान के बजाय केवल 'संतान पैदा करने वाली मशीन' समझ लिया जाता है । जबकि आध्यात्मिक रूप से गुरु नानक साहिब ने भी सिखाया है कि जिस स्त्री के गर्भ से राजा जन्म लेते हैं, उसे भला बुरा कैसे कहा जा सकता है?
कड़वे आंकड़े और वास्तविक स्थिति
संयुक्त राष्ट्र और यूएन वूमन की रिपोर्टों के अनुसार, महिला सशक्तिकरण की बातें अभी भी जमीनी हकीकत से दूर हैं:
दुनिया में हर तीन में से एक महिला शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार होती है ।
समान कार्य के लिए महिलाओं को पुरुषों की तुलना में 20% कम वेतन मिलता है ।
विश्व की संसदों में महिलाओं की भागीदारी मात्र 26% है ।
लगभग 24 करोड़ लड़कियाँ और महिलाएँ आज भी शिक्षा के अधिकार से वंचित हैं ।
घर के बिना वेतन वाले कार्यों का 75% बोझ अकेले महिलाओं के कंधों पर है ।
मानसिक पीड़ा और सामाजिक सोच
हम अक्सर स्त्री के शारीरिक कष्टों की बात तो करते हैं, लेकिन उसकी मानसिक थकान और आंतरिक टूटन को नजरअंदाज कर देते हैं । "घर की इज्जत" के नाम पर न जाने कितनी महिलाएँ अपने सपनों और स्वाभिमान की बलि चढ़ाकर चुपचाप अवसाद झेलती हैं । वह पत्थर नहीं है; वह भी थकती है और उसे भी सम्मान व सुरक्षा की आवश्यकता है ।
**निष्कर्ष**
महिला दिवस का अर्थ केवल शुभकामनाएँ देना या उपहार देना नहीं होना चाहिए । वास्तविक सम्मान तब होगा जब उन्हें निर्णय लेने में समान भागीदारी और घरेलू हिंसा से पूर्ण मुक्ति मिलेगी । जहाँ स्त्री का सम्मान नहीं होता, वहाँ सुख-समृद्धि और शांति कभी नहीं ठहरती । स्त्री का हृदय इतना विशाल है कि वह स्वयं टूटकर भी रिश्तों को जोड़ना जानती है । अब समय है कि हम अपनी सोच बदलें और उसे वह स्थान दें जिसकी वह हकदार है।