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बढ़ती उम्र के साथ सतर्कता का ध्यान रखना ज़रूरी - बुढ़ापा जवानी नहीं लाता, जवानी बचपन नहीं लाती - Uturn Time
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बढ़ती उम्र का तकाज़ा : उम्र के बढ़ने के साथ सेहत में भी बदलाव आते हैं - सेहत का ध्यान रखने फिटनेस टिप्स, घरेलू उपाय और तनाव से दूर रहना ज़रूरी - एडवोकेट किशन सनमुखदास भाववनी गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया - कुदरत द्वारा बनाई इस अनमोल सृष्टि में मानवीय जीवन की रफ्तार इतनी तेज़ हो गई है कि सुबह से शाम तो क्या बचपन से पचपन तक कैसे पहुंच गए पता ही नहीं चलता वर्तमान परिपेक्ष में बढ़ती जीवन चक्र की प्रक्रिया में संघर्षों खुशियों, दुखों, रोजी-रोटी, घर परिवार, सांसारिक मोह माया इत्यादि अनेक क्रियाओं के चक्कर में अधिकतम मानवी जी ऐसे उलझ गए हैं कि उन्हें अपने शरीर,बढ़ती उम्र का तकाज़ा ही नहीं रहा! मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि सच्चाई यह है कि बढ़ती उम्र के साथ-साथ सतर्कता का ध्यान रखना अत्यंत ज़रूरी है। यूं समझो बुढ़ापा जवानी नहीं, लाता जवानी बचपन नहीं लाती!इसलिए उम्र के बढ़ने के साथ सेहत में भी बदलाव आते हैं। सेहत का ध्यान रखना, फिटनेस टिप्स, घरेलू उपाय और तनाव से दूर रहना अत्यंत जरूरी है। साथियों बात अगर हम चालीस प्लस उम्र की करें तो आपकी उम्र चालीस वें पड़ाव पर पहुंच चुकी है और चालीस की उम्र पर पहुंचने का मतलब है अपनी सेहत का पहले से अधिक ध्यान रखना। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती रहती है वैसे-वैसे सेहत में भी बदलाव आते रहते हैं।साथियों संभव हो तो हमें निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए (1) बढ़ती उम्र के साथ-साथ शरीर में विटामिन, मिनरल्स, कैल्शियम, आयरन और एंटीआक्सीडेंट की कमी महसूस होने लगती है। इसलिए भोजन में ऐसी चीजों को अधिक शामिल करें, जो इन सभी पोषक तत्वों की आपूर्ति कर सके।(2) अत्यधि‍क गुस्सा और चिंता करने से बचें, साथ ही शारीरिक श्रम भी उतना ही करें, जितना आपके स्वास्थ्य के लिए सही हो। अत्यधिक परिश्रम करने से बचें। (3) बेहतर होगा कि चालीस से अधि‍क उम्र होने पर, आप अपनी आदतों और दिनचर्या में बदलाव लाएं। इस अवस्था में आपका शरीर उतना स्वस्थ और उर्जावान नहीं होता। अपने खान-पान और दिनचर्या में बदलाव कर आप उर्जा के साथ ही लंबी उम्र भी पा सकते हैं। (4) घर पर बने पौष्टिक सूप आपकी सेहत के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं। भोजन के बीच में भूख लगने पर आप इनका सेवन कर सकते हैं। (5) चालीस से अधिक उम्र वालों के लिए एंटीऑक्सीडेंट युक्त आहार लेना बेहद आवश्यक है। इसलिए हरी सब्ज‍ियां, वेजिटेबल जूस, सलाद, फल, ग्रीन-टी आदि का सेवन अवश्य करें। (6) इस समय आपके शरीर के सभी अंगों और मांसपे‍शि‍यों ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, इसलिए खान-पान को बैलेंस रखें ताकि आपका लिवर सुरक्षित रहे और शरीर से विषैले तत्वों को बाहर कर सके। (7) चालीस की उम्र के बाद अक्सर छोटी- छोटी बातों का तनाव और चिड़चिड़ापन होता है साथ ही दिमाग भी कमजोर होने लगता है। इसके लिए योगा, व्यायाम, मेडिटेशन, संगीत को अपनी दिनचर्या में शामि‍ल करें। साथ ही वह काम करें जिसे करने में आपको आनंद आता है और जिसमें आपका मन लगता है। (8) साबुत अनाज को अपने भोजन में शामिल करें और फलों का भरपूर सेवन करें। इत्यादि के अलावा और भी आने की टिप्स है जिनकी सहायता से सतर्कता बरती जा सकती है। साथियों बात अगर हम, बढ़ती उम्र के तकाज़े से निपटने के लिए उपायों की करें तो, शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, और स्वस्थ आहार अपनाना ज़रूरी है, साथ ही, संक्रमणों से बचने के लिए टीका लगवाना भी फ़ायदेमंद होता है। एक स्वास्थ्य संस्थान के मुताबिक, शारीरिक गतिविधि से हृदय स्वास्थ्य बेहतर रहता है और वज़न नियंत्रित रहता है--(1) बढ़ती उम्र के लक्षणों को कम करने के लिए, ये उपाय अपनाए जा सकते हैं: (2रोज़ाना दल चलें, साइकल चलाएं, या तैरें(3)योग करे (4)पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं(5)6 से 7 घंटे की नींद लें6)हेल्दी चीज़ें खाएं( 7)नियमित रूप से एक्सरसाइज़ करे(8)टीका लगवाएंबढ़ती उम्र में स्वस्थ रहने के लिए, इन बातों का ध्यान रखना चाहिए: (1)शारीरिक गतिविधि से शरीर में ब्लड का सर्कुलेशन सही रहता है(2)पर्याप्त नींद लेने से त्वचा की डैमेज रिपेयर होती है(3)नियमित एक्सरसाइज़ से हार्ट डिज़ीज़ और कैंसर का खतरा कम होता है 4)शारीरिक गतिविधि से मूड अच्छा रहता है (5)शारीरिक गतिविधि से हड्डियां मज़बूत होती हैं (6)पर्याप्त नींद लेने से झुर्रियां पड़ने की प्रक्रिया धीमी होती उम्र का बढ़ना जन्म से ही निर्धारित और शुरू हो जाने वाली सामान्य प्रक्रिया है जिसे रोकना असंभव है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, शरीर अपना आकार यानी लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई, शारीरिक गठन, मानसिक स्वास्थ्य और काम करने की ऊर्जा प्राप्त करता जाता है। बचपन, यौवन और वृद्धावस्था अर्थात शरीर का भरपूर उपयोग करने के बाद सम्पूर्ण परिपक्वता की स्थिति आती है तो यह सोच बनने लगती है कि अब बहुत हुआ, बहुत जी लिए, जो करना था या जैसी नियति या भाग्य था, वह सब कर लिया, अब शांति या मुक्ति मिले और प्रभु के चरणों में स्थान प्राप्त हो।उम्र का तकाजा बेशक हो, स्वस्थ रहकर जीना एक कलाहै, उम्र का बढ़ना जन्म से ही निर्धारित और शुरू हो जाने वाली सामान्य प्रक्रिया है जिसे रोकना असंभव है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, शरीर अपना आकार यानी लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई, शारीरिक गठन, मानसिक स्वास्थ्य और काम करने की ऊर्जा प्राप्त करता जाता है। बचपन, यौवन और वृद्धावस्था अर्थात शरीर का भरपूर उपयोग करने के बाद सम्पूर्ण परिपक्वता की स्थिति आती है तो यह सोच बनने लगती है कि अब बहुत हुआ, बहुत जी लिए, जो करना था या जैसी नियति या भाग्य था, वह सब कर लिया, अब शांति या मुक्ति मिले और प्रभु के चरणों में स्थान प्राप्त हो।जीवन और मरण अपने हाथ में नहीं होने से उम्र के उस पड़ाव पर पहुंचने के बाद जिसमें करने के लिए न तो कुछ हो और न ही कुछ करने की इच्छा हो लेकिन उम्र का खाता बंद न हो रहा हो और अपने को असहाय, बेचारा समझने और दूसरों पर निर्भर रहने की स्थिति हो जाए तो मन उदास रहने लगता है, शरीर तथा मस्तिष्क दोनों ही ढीले पडऩे लगते हैं। तो क्या जीवन अगर बाकी है तो उसे आनंद लेते हुए और मनोरंजन के साथ नहीं जीना चाहिए, यह प्रश्न उन लोगों को अपने आप से करना जरूरी हो जाता है जो पहले की तरह स्वतंत्र, मुक्त और बेफिक्र होकर जिंदगी व्यतीत करना चाहते रहे हैं? सन् 1950 में जहां एक भारतीय की औसत आयु 35 वर्ष थी वहां अब यह दोगुनी होकर 70 तक पहुंच गई है। इसका अर्थ यह हुआ कि इसके बाद भी 80 से 100 वर्ष तक जीने की कल्पना की जा सकती है। इसी तरह दुनिया में ऐसे बहुत से देश हैं जिनमें औसत आयु 80-85 वर्ष है अर्थात वहां रहने वाले सौ साल से अधिक जीने के बारे में सोच सकते हैं। बढ़ती उम्र में यदि इसी सोच के साथ जीने की कोशिश की जाए कि हमारी सोच अभी भी वैसी है जैसी कि तब थी जब हम अब से आधी उम्र के थे तो वृद्धावस्था का डर नहीं रहेगा और व्यक्ति आनंदपूर्वक जी सकेगा। अपने शौक हों या कोई भूली बिसरी इच्छा हो अथवा घूमने-फिरने, नई जगहों पर जाने का मन हो, यहां तक कि अपने रिश्तों का दायरा बढ़ाने की इच्छा हो तो इस उम्र में पीछे मुड़कर न देखना और उम्र को मनोरंजन की एक शैली मानते हुए जीना ही सबसे बेहतर है। और अब तो सरकार भी रिटायर्ड लोगों को नौकरी देने के बारे में सोच रही है क्योंकि उम्र कभी भी युवा होने की सोच पर हावी नहीं हो सकती। उम्र के असर से बचकर रहना है तो अपने खाने पीने, सोने जागने, सेहत का ध्यान रखते हुए अपने शरीर और मन की जांच पड़ताल कराते हुए ही जीना सर्वश्रेष्ठ है। साथियों बात अगर हम पचास प्लस उम्र की करें तो, पचास साल की उम्र के बाद कुछ कारक हो सकते हैं, जिनके कारण भोजन का सेवन कम हो सकता है। इसमें शामिल है भूख की कमी, स्वाद या गंध पहचानने की कमी, चबाने या निगलने में कठिनाई, शारीरिक शक्ति या गतिशीलता की कमी, गंभीर बीमारी या दवाओं का सेवन, भावनात्मक स्थिति, वित्तीय सुरक्षा शामिल आदि। पचास साल या इससे ज्यादा की उम्र के लोगों को समझना जरूरी है कि उन्हें क्या करना चाहिए क्या नहीं। आसानी से पचने वाले, आसानी से अवशोषित होने वाले, छोटे-छोटे टुकड़ों में लगातार भोजन लें। शक्कर, मीठे पेय पदार्थ, अनडाइल्यूटेड जूस के सेवन को कम करें। फलों को प्राथमिकता दें। अपने आहार में बहुत सारे तरल पदार्थ शामिल करें, क्योंकि वे आपको हाइड्रेटेड रखते हैं और पाचन बेहतर करते हैं। रिफाइन्ड अनाज और दालों की जगह साबुत अनाज और दालों का इस्तेमाल करें। आहार में फाइबर की संरचना मध्यम होनी चाहिए। शारीरिक रूप से सक्रिय रहें। हर दिन के भोजन में मौसमी फलों के दो-तीन सर्विंग्स शामिल करने चाहिए। साथियों बात अगर हम माननीय पीएम द्वारा मन की बात की 87वीं कड़ी में 126 वर्षीय बाबा शिवानंद के उल्लेख की करें तो उनके फिटनेस के बारे में उन्होंने कहा, एक पदम् सम्मान समारोह में आपने बाबा शिवानंद जी को ज़रुर देखा होगा। 126 साल के बुजुर्ग की फुर्ती देखकर मेरी तरह हर कोई हैरान हो गया होगा और मैंने देखा, पलक झपकते ही, वो नंदी मुद्रा में प्रणाम करने लगे। मैंने भी बाबा शिवानंद जी को झुककर बार-बार प्रणाम किया। 126 वर्ष की आयु और बाबा शिवानंद की फिटनेस, दोनों, आज देश में चर्चा का विषय है। मैंने सोशल मीडिया पर कई लोगों का कॉमेंट देखा, कि बाबा शिवानंद, अपनी उम्र से चार गुना कम आयु से भी ज्यादा फिट हैं। वाकई, बाबा शिवानंद का जीवन हम सभी को प्रेरित करने वाला है। मैं उनकी दीर्घ आयु की कामना करता हूँ। उनमें योग के प्रति एक पैशन है और वे बहुत हैल्थी लाइफस्टाइल जीते हैं। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि बढ़ती उम्र का तकाज़ा है, बढ़ती उम्र के साथ सतर्कता का ध्यान रखना अत्यंत ज़रूरी है। बुढ़ापा जवानी नहीं लाता!!जवानी बचपन नहीं लाती,उम्र के बढ़ने के साथ सेहत में भी बदलाव आता है। सेहत का ध्यान रखने, फिटनेस टिप्स, घरेलू उपाय और तनाव से दूर रहना ज़रूरी है। *-संकलनकर्ता लेखक - क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र *